मंदिर का परिचय
शिप्रा के तट पर भैरवगढ़ में विराजमान काल भैरव उज्जैन के रक्षक और नगर कोतवाल माने जाते हैं। स्कंद पुराण के अवंती खंड में इस तीर्थ का उल्लेख मिलता है और यहाँ भगवान को मदिरा का भोग लगाने की तांत्रिक परंपरा देशभर में प्रसिद्ध है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि महाकाल के दर्शन काल भैरव के दर्शन के बाद ही पूर्ण होते हैं।
- सुबह 6:30 पट खुलते हैं
- सुबह 8:00 प्रातः आरती
- रात 8:30 संध्या आरती
- रात 9:30 पट बंद होते हैं
इतिहास
काल भैरव मंदिर उज्जैन के पुराने नगर से कुछ किलोमीटर उत्तर में, शिप्रा के तट पर भैरवगढ़ में स्थित है। परंपरा के अनुसार मूल मंदिर भद्रसेन नाम के राजा ने बनवाया था और स्कंद पुराण के अवंती खंड में इस स्थान की महिमा कही गई है। यहाँ से परमार काल (9वीं से 13वीं सदी) की शिव, पार्वती, विष्णु और गणेश की प्रतिमाएँ मिली हैं, जिससे पता चलता है कि इस स्थान पर पूजा-अर्चना सदियों से होती आ रही है। आज जो भवन दिखाई देता है वह उसी पुराने मंदिर के अवशेषों पर खड़ा है और उस पर मराठा शैली की स्पष्ट छाप है। इसका संबंध मराठा सेनापति महादजी शिंदे से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि 1761 में पानीपत की पराजय के बाद उन्होंने अपनी पगड़ी भगवान को अर्पित की और आगे चलकर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। लोक-मान्यता इस मंदिर को इससे भी कहीं अधिक प्राचीन बताती है, पर वह दावा आस्था पर टिका है, किसी तिथि-प्रमाण पर नहीं।

काल भैरव की कथा
पुराणों की परंपरा के अनुसार भैरव भगवान शिव के क्रोध से प्रकट हुआ रौद्र स्वरूप हैं। प्रचलित कथा है कि जब ब्रह्मा जी को अहंकार हो गया, तब भैरव प्रकट हुए और उन्होंने ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर काट दिया। इससे उन पर ब्रह्महत्या का दोष लगा और वे उससे मुक्ति की खोज में भटकते रहे। उज्जैन में कही जाने वाली परंपरा के अनुसार उन्होंने शिप्रा के तट पर तपस्या की, दोष से मुक्त हुए और यहीं विराजमान हो गए। भक्तों की मान्यता है कि तभी से वे अवंतिका के कोतवाल, यानी नगर के रखवाले, और भगवान महाकाल के सेनापति के रूप में इस नगरी की रक्षा करते हैं। इसी कारण श्रद्धालु कहते हैं कि महाकालेश्वर के दर्शन काल भैरव के सामने शीश नवाने के बाद ही पूर्ण होते हैं। ये कथाएँ आस्था और शास्त्र-परंपरा का हिस्सा हैं और यहाँ उसी रूप में कही गई हैं जैसे परंपरा इन्हें सुनाती है।
मंदिर और स्थापत्य
मराठा शैली का ऊँचा पत्थर का प्रवेश द्वार, जिसमें मेहराबदार दरवाज़ा और बाहर निकले झरोखे हैं, परकोटे से घिरे मंदिर परिसर में ले जाता है। भीतर मंदिर एक ऊँचे चबूतरे पर बना है, जहाँ चौड़ी सीढ़ियों से पहुँचा जाता है। इसका स्तंभों वाला सभामंडप चारों ओर से खुला है और गर्भगृह के ऊपर छोटा-सा शिखर है। यहाँ भगवान की पूरी गढ़ी हुई मूर्ति नहीं है। काल भैरव का मुख एक शिला के रूप में है जिस पर सिंदूर की मोटी परत चढ़ी है, और उस पर चाँदी का मुखौटा तथा मराठा शैली की पगड़ी सजती है। यह परंपरा महादजी शिंदे के समय से चली आ रही मानी जाती है। कभी मंदिर की दीवारें मालवा शैली के चित्रों से सजी थीं, जिनके अब केवल निशान बचे हैं। आँगन में काले पत्थर की दीपमालिका, यानी दीपों का स्तंभ, खड़ी है। परिसर में पाताल भैरवी नाम की एक सँकरी भूमिगत गुफा और दत्तात्रेय का छोटा मंदिर भी बताया जाता है।

मदिरा भोग की परंपरा
उज्जैन के काल भैरव मदिरा के भोग के लिए देशभर में जाने जाते हैं। यह प्रथा तांत्रिक उपासना से आई है, जिसमें मद्य पंचमकार कहे जाने वाले पाँच अनुष्ठानिक अर्पणों में से एक है। यहाँ वास्तव में केवल मदिरा ही चढ़ाई जाती है, बाकी चार का पालन प्रतीक रूप में होता है। श्रद्धालु बोतल पुजारी को सौंपते हैं। पुजारी उसमें से कुछ मदिरा एक छिछली तश्तरी में डालकर मंत्र पढ़ते हैं और तश्तरी को भगवान के मुख से लगाते हैं। मदिरा धीरे-धीरे तश्तरी से कम होती दिखती है और बची हुई मदिरा प्रसाद के रूप में लौटा दी जाती है। पुजारियों के अनुसार नित्य पूजा में भगवान को दिन में पाँच बार मदिरा का भोग लगता है। 1 अप्रैल 2025 से उज्जैन नगर निगम सीमा में शराब की बिक्री बंद है और मंदिर के बाहर के काउंटर भी बंद हो चुके हैं, पर भोग की परंपरा जारी है। मदिरा चढ़ाना पूरी तरह ऐच्छिक है। फूल, नारियल, अगरबत्ती और मिठाई भी उतनी ही श्रद्धा से स्वीकार की जाती है।

धार्मिक महत्व
काल भैरव उज्जैन के रक्षक देवता के रूप में पूजे जाते हैं। अष्ट भैरव, यानी आठ भैरवों की उपासना इस नगरी की शैव परंपरा का पुराना अंग है और काल भैरव उनमें प्रमुख माने जाते हैं। इतिहास में यह मंदिर कापालिक और अघोर संप्रदायों से जुड़ा रहा है, जिनका उज्जैन एक बड़ा केंद्र था। आज भी यह स्थान तांत्रिक साधना के साथ-साथ आम गृहस्थ श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। लोग यहाँ भय से रक्षा, बाधाओं से मुक्ति और कठिन समय में साहस की कामना लेकर आते हैं। वर्ष 2026 में मंदिर अधिकारियों के हवाले से बताया गया कि सामान्य दिनों में लगभग चालीस से पैंतालीस हज़ार श्रद्धालु यहाँ आते हैं और शनिवार-रविवार तथा पर्वों पर यह संख्या कहीं अधिक हो जाती है। अधिकतर तीर्थयात्रियों के लिए यह मंदिर उज्जैन यात्रा का अनिवार्य पड़ाव है, जहाँ वे महाकालेश्वर, हरसिद्धि और मंगलनाथ के साथ दर्शन करते हैं।
काल भैरव की सवारी
वर्ष में दो बार काल भैरव अपने मंदिर से निकलकर अपने क्षेत्र के भ्रमण पर जाते हैं। यह सवारी भाद्रपद मास की डोल ग्यारस पर और फिर मार्गशीर्ष (अगहन) मास की भैरव अष्टमी के अगले दिन निकलती है। दोपहर बाद ज़िला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक भगवान के रजत मुखारविंद का पूजन करते हैं। मुखारविंद पालकी में विराजित होता है और उसे इस अवसर के लिए ग्वालियर के सिंधिया परिवार की ओर से भेजी गई पगड़ी धारण कराई जाती है। मंदिर के द्वार पर सशस्त्र पुलिस बल की टुकड़ी गार्ड ऑफ ऑनर देती है। बैंड, घोड़ों, ढोल और झाँकियों के साथ सवारी भैरवगढ़ केंद्रीय जेल पहुँचती है, जहाँ भगवान का पूजन होता है और बंदी भी दर्शन करते हैं। इसके बाद सवारी शिप्रा तट पर सिद्धवट जाती है, वहाँ पूजन होता है और शाम को सवारी वापस मंदिर लौट आती है।
एक नज़र में
- आराध्य
- काल भैरव, शिव का रौद्र रूप
- मान्यता
- उज्जैन के नगर कोतवाल और महाकाल के सेनापति
- परंपरा
- शैव एवं तांत्रिक; अष्ट भैरवों में प्रमुख
- प्रसिद्धि
- भगवान को मदिरा का भोग
- शास्त्रीय उल्लेख
- स्कंद पुराण का अवंती खंड
- काल
- प्राचीन स्थल, परमार काल (9वीं–13वीं सदी) के अवशेष; वर्तमान भवन मराठा कालीन, 18वीं सदी
- स्थान
- भैरवगढ़, शिप्रा तट, महाकालेश्वर से लगभग 6 किमी उत्तर
- प्रमुख पर्व
- भैरव अष्टमी (काल भैरव जयंती)